साज़िश - ए - इश्क़
मुमकिन नहीं होता छुपाना वो दर्द
जिसे हमने ज़िस्मो पे ओढ़ रखा है
कैसे भुला दू तेरी दरिदंगी,तूने तो
मोहब्बत को हवस का नाम दे रखा हैदुआ करूंगी तेरी ख्वाहिश कभी
मुकम्मल ना हो
अब कोई और तेरी साज़िश में शामिल
ना हो
वरना उठ जाएगा भरोसा लोगो को
मोहब्बत से
फिर खुदा भी यही कहेगा अब इस दुनिया
में कोई इश्क़ और मोहब्बत ना हो।

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Thankyou so much for the appreciation.